कुछ परायी सांसे।
अनजानी धड़कनें,
जी रहा हूँ एक ऐसी हकीकत किसके अस्तित्व पे भरोसा नहीं।
कुछ कोरे पन्नों का हासिल है आज
कुछ सूखे पत्तो का हासिल है आज
खुद ही का दोषी हुआ बैठा लिख रहा हूँ अपनी ही अस्तित्व की दास्ताँ।
उन आसुओं की गलती नहीं
उस मुस्कराहट का दोष नहीं
नसीब है, हकीकत है
पक्के इरादों ने किये कुछ ऐसे वादे
जिनका हिसाब देती है आज ज़िन्दगी
उन इरादों पे हस्ती है, रोती है, मुस्कुराती है ज़िन्दगी।
आज झांकी है पीछे से एक सांस,
पर जल्दी ही खो जायेगी।
अनजानी धड़कनो में पहचानी से एक धड़कन...खो जायेगी।
कुछ ख्वाबो को बदन लेते देखा है।
हकीकत से खेलते देखा है।
पर ख्वाब ख्याब ही होते हैं, हकीकत नहीं
धड़कन मेरी ही है किसी और की नहीं।
Wednesday, August 10, 2016
मेरा असमंजस
Sunday, August 21, 2011
मेरा सच
मेरा सच
अजब हुई बसर यह ज़िन्दगी यहाँ,
चेहरों पर नकाब और नकाबों की कथा
भ्रमित दुनिया के बीच में,
मुझ अकेले की कृत्रिम कथा।
खोजता हूँ सत्य दुर्लभ ही सही...
मिथ्या मध्य स्थित मैं अकेला यहाँ।
अनेक वर्तायों में सत्य एक,
उस एक सच की झूठी कथा।
प्राथमिकता की सीमा पर पाया मैंने,
पात्र प्रथम नाट्य मैत्री...
फिर चंचल सत्य ने भ्रमित करके
प्रदान की एक झूठी ख़ुशी।
सच झूठ के चक्रव्यूह में
फँसी दृष्टी से लाचार मैं,
ढूंढता हूँ खुद ही की वास्तविकता का प्रकाश...
Thursday, March 3, 2011
dreams
have u a dream that can keep u up?
give u wings that can take u up?
have u a reason to keep going all day?
a twinkle in ur eyes with belief all the way?
have u a notion to defy all odds?
to push u a little further against all odds?
do u have the perception of night and day?
or jus 24 hrs given to u all the way?
have u a voice thats left unheard?
with silent screams and unspoken words?
just spread ur wings and conquer ur desire..
let dreams be ur guide and be what u admire..
just dream!
Sunday, February 6, 2011
untitled as yet
हैरान है आसमान, ख्वाबों की उड़ान कहाँ तक है।
खुद सपने भी हैरान हैं, हकीकत का दायरा कहाँ तक है।
इरादों की महफ़िल में एक सहमा सा ख्वाब,
उस ख्वाब की हकीकत कहाँ तक है!
खुद सपने भी हैरान हैं, हकीकत का दायरा कहाँ तक है।
इरादों की महफ़िल में एक सहमा सा ख्वाब,
उस ख्वाब की हकीकत कहाँ तक है!
Monday, January 10, 2011
impersonate me

invitation to my amnestic privilege is often found
ignorance provides me the shadows to hide
i hide from the truths light
freedom from excoriation
comfortable in my cynical self
warm emotions only mean anger
cold heart being cherished as never before
selfishness is the new selfless belief
i prioritise objects on my heartly notion
ask for my freedom and i might give u some of mine,
a fortress encapsulation me and i m content
directions might just lose themselves here,
no destination to any roads in me,
come inside and experience me,
im sure it'll be a ride of a lifetime,
you wont get the life back once you're in,
for the ride ends with life, either yours or mine.
rush and chaos left far behind,
its pure entropy here inside.
feel the rage of the fire,
cold of the silence is here,
where subtleness can be unbearable,
and speeds cease to be exciting enough.
come inside and you might just be lucky,
get detached from the physical self.
be one with me, or rather, if u have it in u,
impersonate me!!
Thursday, December 16, 2010
अकेले पल
अकेले पल
कभी कभी कुछ अकेले पल, एक बात के पीछे मंडलाते हैं,
मन में असंख्य असंभव एकाएक जैसे शूल बन जाते हैं,
कुछ बीती घटनाओं के पीछे ज़िन्दगी मुड़ने लगती है,
कुछ बीते पलों के पीछे अगले पल पछताते हैं।
एक अकेला मैं न जाने कितने दुखों का कारण हूँ,
सोच असंभव सत्य मूर्ख दुःख का कारन बन जाता हूँ,
उन अकेले पलों के जवाब ख़ामोशी दिए जाती है,
मैं बस खामोश रह जाता हूँ, वे प्रश्न पूछे जातें हैं।
कभी कभी कुछ अकेले पल ऐसे विचार दे जाते हैं,
आखरी सांसें हो बस जिनमें, एक ऐसा भविष्य दिखाते हैं,
एक निश्चित मृत्यु का एहसास जब मुझको होता है,
कुछ पलों के जीवन से मुझे ये डराते हैं,
खुदसे पलायन का मैं मृत्यु, ऐसा हल ढूँढ़ता हूँ,
भविष्य से पलायन करके मैं पिछले पलों की और दौड़ता हूँ,
अकसर अकेले पलों में ऐसे विचार कई आ जाते हैं,
पर सोचता हूँ मैं यूँही वे विचार क्यों रह जाते हैं?
कभी कभी कुछ अकेले पल मुझे प्रेरित भी करते हैं,
पूछता हूँ मैं खुदसे यूँही, अकेले पल क्यों आते हैं?
जब साहिल से आश्रय लेकर मैं खुदको संभालता हूँ,
फिर बीते सैलाबों की याद ये मुझे क्यों दिलाते हैं?
अनकहे प्रश्नों के उत्तर मैं दिए क्यों जाता हूँ?
कुछ बीते पलों के पीछे क्यों जीवन त्यागने जाता हूँ?
एक अकेला दीप भी रात को प्रकाशित कर देता है,
ये तो मुझसे ही मेरे सारे दीप बुझवा देते हैं।
कभी कभी कुछ अकेले पल मुझे उत्तर भी देते हैं,
कठोर सत्य का वर्णन करके मुझको चौंका देते हैं,
पल कहते हैं, उन पलों में, यही सोचता रह जाऊंगा,
कभी कभी न उन पलों से अकेलापन हटाऊंगा
कभी कभी कुछ अकेले पल मुझसे कहा करते हैं,
मुझसे अलग होकरके वे अकेलेपन से डरते हैं।
दो रास्ते
कहाँ है आरज़ू ? एक सफ़र की, एक ज़िन्दगी की ?
परछाईयों में छिपी है ख्वाइश ,
गुज़रते मंज़रों की तरह धुंधली हैं सांसें ,
कमज़ोर हैं आँखें , नज़र भी, नज़ारे भी,
अब फिजाओं की खामोशी चुभती नहीं,
नम हूँ , मैं भी, मौत भी...
अजीब सौदा है ज़िन्दगी,
सौदा मेरा, सौदागर ज़िन्दगी,
क्या खर्च कर दूँ वो धुंधली सांसें ?
खरीदने में खुदको खुदसे ही?
वक़्त थम जाये चाहूँ, पर थमता नहीं,
लौट जायें वो मंज़र, पर लौटते नहीं,
रुक जायें यह सांसें, पर रुकतीं नहीं।
हर सफ़र का अदि है, अंत है।
किनारे पर कड़ी ज़िन्दगी मुस्कुराती है।
हर सवाल का जवाब, या सही, या गलत,
दो रास्ते हैं, एक ज़िन्दगी, एक मौत।
हम दोनों के रास्ते एक हैं,
पर ज़िन्दगी?
अब भी कड़ी मुस्कुरा रही है।
सौरभ नंदा
2007
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