Thursday, December 16, 2010

अकेले पल

अकेले पल


कभी कभी कुछ अकेले पल, एक बात के पीछे मंडलाते हैं,
मन में असंख्य असंभव एकाएक जैसे शूल बन जाते हैं,
कुछ बीती घटनाओं के पीछे ज़िन्दगी मुड़ने लगती है,
कुछ बीते पलों के पीछे अगले पल पछताते हैं
एक अकेला मैं जाने कितने दुखों का कारण हूँ,
सोच असंभव सत्य मूर्ख दुःख का कारन बन जाता हूँ,
उन अकेले पलों के जवाब ख़ामोशी दिए जाती है,
मैं बस खामोश रह जाता हूँ, वे प्रश्न पूछे जातें हैं


कभी कभी कुछ अकेले पल ऐसे विचार दे जाते हैं,
आखरी सांसें हो बस जिनमें, एक ऐसा भविष्य दिखाते हैं,
एक निश्चित मृत्यु का एहसास जब मुझको होता है,
कुछ पलों के जीवन से मुझे ये डराते हैं,
खुदसे पलायन का मैं मृत्यु, ऐसा हल ढूँढ़ता हूँ,
भविष्य से पलायन करके मैं पिछले पलों की और दौड़ता हूँ,
अकसर अकेले पलों में ऐसे विचार कई जाते हैं,
पर सोचता हूँ मैं यूँही वे विचार क्यों रह जाते हैं?


कभी कभी कुछ अकेले पल मुझे प्रेरित भी करते हैं,
पूछता हूँ मैं खुदसे यूँही, अकेले पल क्यों आते हैं?
जब साहिल से आश्रय लेकर मैं खुदको संभालता हूँ,
फिर बीते सैलाबों की याद ये मुझे क्यों दिलाते हैं?
अनकहे प्रश्नों के उत्तर मैं दिए क्यों जाता हूँ?
कुछ बीते पलों के पीछे क्यों जीवन त्यागने जाता हूँ?
एक अकेला दीप भी रात को प्रकाशित कर देता है,
ये तो मुझसे ही मेरे सारे दीप बुझवा देते हैं



कभी कभी कुछ अकेले पल मुझे उत्तर भी देते हैं,
कठोर सत्य का वर्णन करके मुझको चौंका देते हैं,
पल कहते हैं, उन पलों में, यही सोचता रह जाऊंगा,
कभी कभी उन पलों से अकेलापन हटाऊंगा
कभी कभी कुछ अकेले पल मुझसे कहा करते हैं,
मुझसे अलग होकरके वे अकेलेपन से डरते हैं। 
दो रास्ते
कहाँ है आरज़ू ? एक सफ़र की, एक ज़िन्दगी की ?
परछाईयों में छिपी है ख्वाइश ,
गुज़रते मंज़रों की तरह धुंधली हैं सांसें ,
कमज़ोर हैं आँखें , नज़र भी, नज़ारे भी,
अब फिजाओं की खामोशी चुभती नहीं,
नम हूँ , मैं भी, मौत भी...
अजीब सौदा है ज़िन्दगी,
सौदा मेरा, सौदागर ज़िन्दगी,
क्या खर्च कर दूँ वो धुंधली सांसें ?
खरीदने में खुदको खुदसे ही?
वक़्त थम जाये चाहूँ, पर थमता नहीं,
लौट जायें वो मंज़र, पर लौटते नहीं,
रुक जायें यह सांसें, पर रुकतीं नहीं।
हर सफ़र का अदि है, अंत है।
किनारे पर कड़ी ज़िन्दगी मुस्कुराती है।
हर सवाल का जवाब, या सही, या गलत,
दो रास्ते हैं, एक ज़िन्दगी, एक मौत।
हम दोनों के रास्ते एक हैं,
पर ज़िन्दगी?
अब भी कड़ी मुस्कुरा रही है।
सौरभ नंदा
2007